अर्श को सामान्य भाषा मे बवासीर या मस्सा कहा जाता है. आयुर्वेद मे इसका प्रमुख कारण जठराग्नि (पाचन शक्ति ) का कमजोर होना बताया गया है.
अर्श होने के कारण
ज्यादा भारी भोजन करना, ठंडा या बासी खाना,
दिन मे अधिक सोना, अधिक मसालेदार खाना या भूख न लगने पर भी खाना, मल मूत्र को रोकनाया मल त्याग करने मे अधिक जोर लगाना. ज्यादा यात्रा करना आदि कारणों से जठराग्नि मंद दुर्बल होकर अर्श की उत्पत्ति करती है.
प्रारम्भिक लक्षण
भोजन ठीक से न पचना, दुर्बलता, पेट फूलना, अधिक डकारे आना, पैर की पिंडलियों मे दर्द होना, मल त्याग मे कष्ट होना, आलस्य, गुदा मे काटने जैसी पीड़ा होना होना, मलत्याग मे कष्ट होना.
प्रकार
1.शुष्क 2. स्त्रावी (खुनी )
लक्षण
मल त्याग मे कष्ट, गूदा मार्ग मे सूजनया मस्से जैसे बाहर आना, मल मार्ग से खून निकलना.
चिकित्सा
1.औषध चिकित्सा
2.क्षार कर्म
3.अग्नि कर्म
4.शस्त्र कर्म
अचिरकलजातानि, अल्पदोषलिङ्गे पद्रवनि भेषजसाधयानि.
जो अधिक पुराने या कम लक्षण वाले हो औषध, से ठीक हो ठीक हो जाते है. रोग के पुराने हो जाने पर, अधिक बढ़ जाने पर, अधिक लक्षणों से युक्त होने पर शस्त्र चिकित्सा ही एक मात्र उपाय है.
क्षार कर्म
आयुर्वेद मे शस्त्र चिकित्सा क्षार सूत्र द्वारा की जाती है इसमें कम दर्द व कम से कम खून निकलता है एवं आसानी सेऑपरेशन हो जाता है. इससे रोग जड़ से नष्ट हो जाता है तथा मल की पेशियों पर नियंत्रण खत्म नहीं होता है. जो इसकी सबसे बड़ी विशेषता है. साथ ही आयुर्वेद दवाई से पाचन शक्ति मे भी सुधार होता है.
डॉ संजय बर्डे
B.A.M.S.
अनुभव 6 वर्ष
👍
ReplyDeleteInformative...
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